क्यूँ की मैने जीना छोड दिया था !

वो दिन था जब मै एक कोने में बैठा करता था… तानहाई में बैठ के पुराने conversations पढा करता tha…

ना हसने की तमन्ना थी ना ही खूश रहेने की इछा… तानहाई में युंही डुबे रहेने का मन करता था…

ताउम्र उसकी यादों में डुबा राहेना चाहता था… किसी यार से मिलना नहीं चाहता था ना ही कुछ share करणा चाहता tha…

उसने दिया हुआ दर्द ना किसीसे share किया और ना ही करणा चाहता था…

सहेम सा गया था एक मुरझे हुए फूल की तरह… कोई पाणी भी डाले तो खिलना नही चाहता था…

क्यूँ की मैने जीना छोड दिया था…

आज भी वो पल याद आते है !

आज भी वो पल याद आते है जब देर रात तक जागता हूं… उसके साथ बात करते करते नींद कब लग जाती थी पता ही नही चलता था… रोज सुबह उसकी तसवीर देख के अपने दीन की शुरुवात करता था..

वो दीन थे जीनमे मुझे मेरी सारी खुशीयां मील गयी थी… एक ही पल में नाजाने कैसे मेरी खुशीयां छिन गयी थी… मै नाजाने उसे अपनी जींदगी मान बैठा था… पर वो कंबख्त युंही मूझसे झूठ बोलती रही और मै उसे सच समझ बैठा था…

उसकी यादोंमे क्या लिखू कहां से शुरुवात करू कुछ समझ नही आता था… आखिर में थक के “प्यार को शब्दों की जरुरत नही” ऐसे बोलके अपने दिल को समझाया करता था…

अब ना याद करणा चाहता हूं ना ही लिखणा चाहता हूं… पर नाजाने क्यूँ इस दिल से पंक्तियां निकलती है… पर जितनी भी निकलती है मेरे दिल के दर्द को अपने साथ लेके निकलती है…